धर्म आध्यात्मधर्म ज्योतिष

धर्म आध्यात्म :: इस संसार रुपी शत्रु से लड़ना है हमें।

इस संसार रुपी शत्रु से लड़ना है हमें।हम मरते क्यूं हैं? बुढ़ापा क्यूं आया? शोक क्यूं सताते हैं? क्यूंकि हमने जन्म लिया है, इसलिए सबसे बड़ा दुःख है जन्म लेना

इस संसार रुपी शत्रु से लड़ना है हमेंPhoto Courtesy: the future times

श्री राम चरित मानस के लंका काण्ड में युद्ध के अवसर पर गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने एक बहुत ही सुन्दर प्रसंग का वर्णन किया है। जिसे “धर्म रथ” के नाम से जाना जाता है। जिस समय कौशलेंद्र भगवान श्रीराम से युद्ध करने के लिए दशानन युद्ध भूमि में युद्ध के समस्त साधनों से सम्पन्न होकर श्री राघवेन्द्र के सम्मुख प्रस्तुत हुआ तो उस समय श्री विभीषण जी ने देखा कि एक ओर साधन सम्पन्न रावण रथ पर और दूसरी ओर भगवान श्रीराम के चरणों में पदत्राण भी नहीं, शरीर पर कवच नहीं, और ना ही उनके पास रथ है तो भला श्री राम जी युद्ध भूमि में ऐसे योद्धा रावण को कैसे पराजित कर सकेंगे। और श्री विभीषण जी अधीर होकर प्रभु से पूछ बैठे –

 नाथ न रथ नहिं तन पद त्राना। केहिं विधि जितब वीर बलवाना।।

भगवान श्री राघवेन्द्र अपने प्रिय सखा विभीषण को सांत्वना प्रदान करते हुए धर्म रथ का वर्णन कर रहे हैं। जिस रथ पर बैठ कर मनुष्य अजेय संसार पर विजय प्राप्त सकता है। मनुष्य संसार में सदा दुःख का ही अनुभव करता है श्रीमद् भगवत गीता के अध्यात्म ज्ञान लक्षण में बतलाया गया है कि- जन्म मृत्यु जरा व्याधि, दुःख दोषानुदर्शनम्।।

जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि इनमें दुःख और दोष का दर्शन ही अध्यात्म ज्ञान का साधन है। मनुष्य नहीं चाहता कि हम मरें। मृत्यु से सभी लोग डरते हैं। लेकिन फिर भी मृत्यु आती ही है। मृत्यु से कोई बच नहीं सकता। तो ये सबसे बड़ा दुःख है मरना। उसके बाद दूसरा दुःख है वृद्धावस्था। वृद्धावस्था भी कोई नहीं चाहता परन्तु देखते ही देखते वृद्धावस्था आ जाती है।

 देखत ही आई विरुधाई जेहिं तैं सपनेहुं नाहिं बुलाई।

गोस्वामी जी कहते हैं कि जिसको तूने स्वप्न में भी नहीं बुलाया वह वृद्धावस्था तुम्हारे देखते ही देखते आ गई। वृद्धावस्था में भी बड़ी विचित्र दशा हो जाती है। भगवान शंकराचार्य जी ने उसका वर्णन किया है-

अंगं गलितं पलितं मुण्डं दसन विहीनं जातं तुण्डम्।

वृद्धों याति गृहीत्वा दण्डं, तदपि न मुञ्चत्याशा पिण्डम्।

अंग गलित हो गए,बाल सफेद हो गये, मुख में एक भी दांत नहीं बचा, वृद्ध होकर हाथ में दण्ड  लेकर चलता है। घर के लोग उसकी उपेक्षा करने लगते हैं। ऐसी परम दु:खद वृद्धावस्था कोई नहीं चाहता किन्तु वह भी आती है।रोग आते हैं शोक के अनेक अवसर आते हैं। मरने से पहले भयंकर वेदना होती है और जन्म से पूर्व गर्भावस्था में रहना पड़ता है। तो इन सब दुखों का कारण हमारे दर्शन शास्त्र में जन्म को ही बतलाया गया है।

हम मरते क्यूं हैं? क्यूंकि हमने जन्म लिया है। बुढ़ापा क्यूं आया? क्यूंकि हमने जन्म लिया है, इसी प्रकार रोग, शोक क्यूं सताते हैं? क्यूंकि हमने जन्म लिया है। इसलिए सबसे बड़ा दुःख है जन्म। अगर एक बार जन्म लेकर दुःख सहना पड़े तो व्यक्ति सहन भी कर ले, लेकिन यह तो अनवरत चल रहा है और इसकी जो अविच्छिन्न श्रृंखला है उसी का नाम संसार है। भगवान शंकराचार्य जी ने कहा-

पुनरपि जननं पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे शयम्

फिर जन्म लेना, फिर मरना, फिर जननी के जठर में निवास करना। और कब कौन जननी मिलेगी इसका भी ठिकाना नहीं। ये कोई आवश्यक नहीं कि मनुष्य मरने के बाद मनुष्य योनि में ही आएगा। कूकर, शूकर, कीट, पतंग विविध योनियों में आ सकता है। तो संसार है। भगवान श्री राम विभीषण जी से कहते हैं कि मित्र! हमें इस संसार रुपी शत्रु से लड़ना है।

महां अजय संसार रिपु, जीति सकइ सो वीर।

 जाके अस रथ होइ दृढ़, सुनहु सखा मतिधीर।।

Tags

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Close
Close