खबरीलाल की विशेष टिप्पणीरायपुर

खबरीलाल की विशेष टिप्पणी :: क्यों नाम पट्टिका में योद्धा बाबा को भुला दिए गए ? खबरीलाल का बड़ा सवाल। आगे पढ़िए…

क्या छत्तीसगढ़ की कांग्रेस की राजनीति में गुटीय राजनीति ने घर कर लिया है। भले कांग्रेस के आला नेता कुछ भी कहे कि हम एक हैं लेकिन देखने पर वो बात नहीं दिखती है जो सत्ता में आने के पहले दिखता था। अकेले एक ही योद्धा ने छग में कांग्रेस को सत्ता पर नहीं बैठाया। इस जीत पर प्रत्येक उपर से जमीनी कार्यकर्ता का अहम किरदार रहा है। जो व्यक्ति साय की तरह भुपेश का साथ दिए, जिन्होंने मेनिफेस्टो बनाया, जिन्होंने सभी नेता से कार्यकर्ता तक को एक ही माला में पिरोकर रखा , आज नया रायपुर में जब छत्तीसगढ़ विधानसभा के नवीन भवन का शिलान्यास हो रहा था उस वक़्त भी वे मंच पर मौजूद थे।

इस शिलान्यास के शिलालेख की तरफ एक बार गौर से प्रत्येक छत्तीसगढ़िया को देखना चाहिए। यदि वे देखेंगे तो उसमें जननेता और सभी जगह पसंद किए जाने वाले नेता का नाम ही नहीं है। वाकई ये आश्चर्य की बात है किंतु सत्य है। आज उनके मन की स्थिति को समझना होगा क्यों कि वे एक ऐसे योद्धा हैं जो हार कर भी बाज़ीगर कहलाना पसंद करते हैं क्यों कि वे हैं “महाराजा”। 

विगत 2019 छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस के मंच से “महाराजा” खुद को सामने लाना बन्द कर दिए या उन्हें बन्द करवाया गया हो। वो वक़्त याद होगा जब 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने बहुमत से ज्यादा सीटें लेकर आई तब छग के जनता, कांग्रेस कार्यकर्ता और कुछ वरिष्ठ विधायक भी ये जानते थे कि छग के राज गद्दी पर कौन बैठने वाले हैं। लेकिन कुछ दिनों की रस्साकस्सी के बाद कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने गद्दी पर बैठने हेतु एक अलग ही नाम ले लिया। इससे छग के अधिक हिस्सों में मायूसी छा गई थी जिसे “महाराजा” ने अपने तरीके, अपने ढंग से संभाला।

उस वक़्त सम्मान या यूं कहें कि सीएम की दौड़ में शामिल टीएस बाबा और ताम्रध्वज साहू को भी शपथ दिलवाया गया। बाद में तो अन्य मंत्रीगण शपथ ग्रहण किये। सरकार में दूसरे स्थान की हैसियत या उससे भी ज्यादा रखने वाले का नाम ही नवीन विधानसभा के शिलान्यास पटल पर लिखा ही नहीं गया।

(संघर्ष के दिनों में हम साथ साथ हैं)

दिल्ली में जब राज गद्दी के लिए रस्सा कस्सी चल रही थी उस समय “महाराजा” के बंगले में सबसे ज्यादा भीड़ थी, चुने हुए विधायक भी आने जाने लगे। प्रत्येक निश्चित थे कि महाराज ही बनेंगे प्रदेश के महाराजा। उधर दूसरी तरफ उस समय के प्रदेश अध्यक्ष के घर पर गिनती के 10-12 लोग ही थे। समय और आलाकामन और राजनीति बहुत बलवान होती है। दिल्ली से पीएल पुनिया और मल्लिकार्जुन खड़गे उड़ के आये और उड़ाते हुए आलाकामन का फैसला सुना गए। वाह! वाह रे लककतंत्र।

आज छग के राजनीतिक पटल के राजा के एक ओर गृह मंत्री दिखते हैं तो दूसरी ओर कृषि मंत्री दिखते हैं। लेकिन “महाराज साहब” नहीं दिखते हैं। 

छत्तीसगढ़ से भाजपा सांसद रेणुका सिंह ने खुलासा किया था साथ ही राजा तय होने के समय भी ये सुगबुगाहट उठी थी कि ढाई ढाई साल का डील हुआ है। देढ़ से ज्यादा साल गुजर गए हैं देखना ये होगा कि अगले ढाई साल में वाकई “महाराज” छग के राज गद्दी का महाराजा होते हैं कि नहीं।

 

 

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