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खबरीलाल विशेष लेख: बस पहुंचना है घर, तपती सड़क और सिर पर गठरियां लादकर बस… चले जा चले जा

वो चले जा रहे हैं…। ट्रकों में ठुंसे हुए। साइकिल पर पोटलियां समेटे…। थोड़ी सी जो जगह बची उस पर बच्चों को बिठाए।… और पैदल भी। सिर पर गठरियां लदी हुईं। यही तो कुल जमा जिंदगी की कमाई है। इनमें मां हैं। तो गर्भवती महिलाएं भी। पर, सब तपती सड़क को नापे जा रहे हैं। पारा 38 डिग्री है। सड़क तप रही है। कोरोना की आपदा अगर सरकारों की लिए चुनौती है तो इनकी भी अग्निपरीक्षा कम नहीं। जिंदगी दोराहे पर नहीं, चौराहे पर है। असमंजस है… जिंदगी किस मोड़ पर ले जाएगी। बस इतना याद है कि हमें घर जाना है। यही उनकी मंजिल है। इंद्रभूषण दुबे की रिपोर्ट

लखनऊ का शहीद पथ हो या लखनऊ अयोध्या हाईवे। हर जगह रेला है। ये रेला है घर जाने वालों का। सबके चेहरे मुर्झाए हैं। कुछ भूख प्यास से तो कुछ भविष्य की चिंता से तो कुछ थकान और बच्चों की बेबसी से। अयोध्या हाईवे पर ही सुक्की मिलती हैं। उनके साथ में पति हैं तो उनकी देवरानी गीता भी हैं। सुक्की सात महीने की गर्भवती है तो गीता चार माह की। दोनों के सिर पर बोरियां हैं। पूछते ही सुक्की कहती हैं-छत्तीसगढ़ से इटौंजा आए थे। यहां मजूरी कर गुजारा चल रहा था। जैसी भी जिंदगी खुशहाल थी। गांव में अम्मां कहती हमार बहुरिया बड़े शहर में नौकरी करत हैं। पर, अब? इस सवाल पर उनके चेहरों पर एक टीस उभर आती है जैसे कोई जख्म कुरेद दिया हो। ऐसा सवाल जिसका कोई जवाब न हो! वो आगे बढ़ती जाती हैं सिर पर लदी बोरियों को संभालते हुए।

मेहनत से गृहस्थी जोड़ी…आपदा में उसे भी बेचना पड़ा

इन्हीं राहों पर मऊ के रहने वाले राहुल पूरे परिवार के साथ मिले। राहुल बताते हैं कि वे अहमदाबाद से चले आ रहे हैं। वहां कारखाने में काम करते थे। कारखाने पर ताला लगा तो दो वक्त की रोटी जुटानी मुश्किल हो गई। जो गृहस्थी जोड़ी थी उसे बेचना पड़ा। आखिर बोझ कितना उठा पाते। दो ट्रॉली बैग और एक पिट्ठू बैग में जो रास्ते के लिए जरूरी था, लेकर निकल पड़े। कहीं लिफ्ट मिल गया तो उसका सहारा ले लिया, नहीं तो पैदल ही…। कानपुर से तो कोई वाहन नहीं मिला। अब तो पैसे भी खत्म हो गए। पैदल चलते पूरे परिवार के पैर सूज गए। ढाई साल की बच्ची नव्या कितना चलती? आखिर मऊ तक ऐसे ही जाना है। इसलिए ट्रॉली बैग ही उसकी गाड़ी बन गई। बहरहाल पुलिसकर्मियों ने कमता तिराहे पर उन्हें रोका और मालवाहक वाहन पर बैठा दिया।

साइकिल से ही निकल लिए मुंबई से

शहीद पथ के कमता तिराहे पर दोपहर करीब 1:30 बजे साइकिल सवार मजदूरों का जत्था छांव मिलते ही रुक गया। इनमें किसी को बिहार के छपरा जाना था तो किसी को सिवान। कुछ गोपालगंज और बेगूसराय के भी। पर, सबकी अलग-अलग कहानी हैं। सिवान के आशु बताते हैं कि आपदाकाल में 40 दिन तो मुंबई में दूसरों के सहारे कट गए, पर कब तक ऐसा चलता? जो कुछ पैसे थे उससे साइकिल खरीद ली। कम से कम भरोसे की सवारी तो है। छपरा के अमित, बेगूसराय के किशन कुमार और गोपालगंज के मनोज की भी यही कहानी है।

गन्ने के रस के ठेले पर चल दिए

कमता तिराहे पर दिन भर ऐसे कई नजारे देखने को मिले जिसकी कल्पना कभी नहीं की जा सकती। सवारियां नहीं मिलीं तो कोई गन्ने के रस के ठेले को ही सवारी बना ली। उसी पर अपने परिवार को बैठाया और चल पड़े। ऐसे भी मिले जो महाराष्ट्र से टेंपो से ही परिवार को लेकर चले आए। इस तरह के कई टेंपो महाराष्ट्र, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली से आते दिखे। इनमें क्षमता से कई गुना ज्यादा सवारियां भरी थीं । ट्रकों और अन्य वाहनों की स्थिति काफी खराब थी।

घर पहुंचने के लिए ऑटो-टैक्सी खरीद लिए

कई मजदूर ऐसे हैं जो मुंबई से ऑटो या टैक्सी से अपने घर जा रहे हैं। कानपुर रोड पर ऐसी कई काली-पीली पट्टी वाली टैक्सी-ऑटो देखकर पुलिसकर्मी हैरान रह गए। मजदूरों ने बताया कि काम-धंधे बंद होने से रोज कमाने-खाने वालों का हाल बुरा है। उन्हें भी घर जाना था इसलिए किसी तरह जोड़-बटोरकर रखे जेवर बेचकर 20-25 हजार रुपये का इंतजाम किया। कोई सवारी थी नहीं इसलिए सबने मिलकर एक से डेढ़ लाख रुपये की पुरानी टैक्सी या ऑटो रिक्शा खरीद लिया। इसी ऑटो रिक्शा या टैक्सी से वह घर के लिए निकल पड़े। रास्ते में किसी ने नहीं रोका। जिसे भी अपनी मजबूरी बताते, वह रोकने या नियम समझाने की जगह अपनी जेब से 100-50 रुपये और निकालकर दे देता।

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